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Saturday, June 6, 2020

NIDHI VOL-2 : THE SECRET AGENT-2



           

            यह सर्दियों के दिन थे। (वैसे अगर सर्दियों की बात करूं तो यह आजकल कुछ ज्यादा ही खतरनाक होती जा रही है।) उन दिनों दिसंबर का महीना लगभग खत्म होने को था और नया साल बेबाक दरवाजे पर खड़ा था। इस खास मौके पर न्यूयॉर्क शहर किसी दुल्हन की तरह सजा प्रतीत हो रहा था। गलियों की रौनक का अपना अलग अंदाज था। लोगों की चहल कदमी में दिलचस्पी हद से ज्यादा थी। रेस्टोरेंट्स, होटल, केफै, बार, डिस्को-क्लब, कोई भी जगह ऐसी नहीं बची थी जहां भीड़ ना हो। ‌नए साल के आने की खुशियां हर किसी के चेहरे से झलक रही थी....... इस बात से अनजान...... कि कहीं कुछ ऐसा भी है जिसका प्रादुर्भाव एक नई रचना का विस्तार करेगा।

एक ऐसी रचना जिसकी शुरुआत होती है एक रहस्यमई घटना से। वैसे इसे रहस्यमई कहना ठीक नहीं, क्योंकि रहस्य का दूसरा मतलब होता है.......हम उसके पीछे की चीजों से अनजान हैं..... और जब आखिर में सच सामने आ जाएगा तो वह रहस्य ..... एक रहस्य ना होकर एक अपराध के पीछे रची साजिश बन जाएगा।

"यात्रीगण कृपया ध्यान दें...." यह आकाशवाणी एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन पर जाने वाली न्यूयॉर्क की सुपरफास्ट ट्रेन में हो रही थी। हल्की आवाज में किसी लड़की के द्वारा कही गई इस अवाज को ट्रेन में हर 30 सेकंड के अंतराल के बाद रिपीट किया जा रहा था  "यात्रीगण कृपया ध्यान दें.... स्टीव ग्रैंड स्टेशन मात्र 2 मिनट की दूरी पर है। कृपया अपनी अपनी सीट छोड़ दरवाजे पर आ जाएं"

जैसे-जैसे समय गुजर रहा था यात्रियों की हलचल भी दरवाजे के पास बढ़ रही थी। सब खुश थे..... किसी के चेहरे पर नए साल की आने की रौनक थी..... तो किसी के चेहरे पर घर जाने की जल्दी....... किसी को भी इस बात का अंदेशा नहीं था की एक हल्की आहट, ठीक इस वक्त जुर्म के खून की रंगी दीवार के पीछे अपना फनं उठाए बैंठी है।

अचानक चलती ट्रेन में अंधेरा हुआ       और......"वुररररररररररररर" ट्रेन की लाइटें जगने बुझने लगी।

सभी लोगों मैं दहशत फैल गईं। ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ था...... तो आज अचानक कैसे...!!

पर यह तो सिर्फ शुरुआत थी... इसके बाद की हुई हलचल में लोगों की चीख पुकार भी पूरी ट्रेन में गूंज उठी.......

अचानक 70 की स्पीड से चलने वाली ट्रेन की रफ्तार बढ़कर 140 तक पहुंच गई। पीछे वाले डब्बे में आग की लपटें उठी और इंजन में कुछ शॉर्ट सर्किट हुए।

ट्रेन लगातार आगे बढ़ती रही उसे जिस स्टेशन पर रुकना था वह वहां पर नहीं रुकी।

इस तरह की अफरातफरी में सब लोगों को अपना भगवान याद आ गया।

हे भगवान हमारी मदद करो जैसी प्रार्थनाएं होने लगी।

और फिर........यहीं पर पता नहीं क्या हुआ....... कि अचानक सब कुछ सामान्य हो गया।

ट्रेन की गई लाइट वापस आ गई..... स्पीड भी धीरे-धीरे नॉर्मल होने लगी...... आकाशवाणी करने वाली लड़की जो कुछ देर पहले खुद सन्नाटे में थी वह भी वापिस आई और आते ही बोली।

"इलेक्ट्रीशियन सिस्टम में हुई गड़बड़ी के कारण आपको इस परेशानी का सामना करना पड़ा..... हमें इसके लिए खेद है..... अब स्थिति बेहतर हैं कृपया अपने-अपने स्थान पर बैठ जाएं..... जल्दी ट्रेन आगे वाले स्टेशन पर रुकेगी"

ट्रेन की गति अब धीरे-धीरे कम हो रही थी और इसी तरह गति को कम करते हुए वह अल्बर्ट स्टेशन पर रुकी।

ट्रेन के रुकते ही लोगों में बाहर निकलने की होड़ मच गई। सब डरे और सहमे हुए थे। पसीने से लथपथ उनका यह डर उनके चेहरे से साफ दिख रहा था। सब एक तरह से मौत के मुंह से बाहर निकल कर आए थे जिनके पीछे का उनका चंद मिनटों का अनुभव उन्हें जिंदगी भर याद रहेगा।


जब सब यात्री उतर गए और स्टेशन के कर्मचारी ट्रेन की जांच के लिए बक्सों को देखने लगे..... अंदर डब्बे को देखते ही वह चिल्लाया
"एक लाश............... डबा नंबर 4..... "जो एक सीट के बगल में मुंह के बल गिरी पड़ी थी.....

****

****

ठीक 2 घंटे बाद।

एक टीम उस लाश का मुआयना कर रही थी। टीम के अलग-अलग सदस्य अलग-अलग जगहों पर हर एक चीज को बारीकी से देख रहे थे। लाश के ठीक पास एक हट्टा कट्टा मोटा स्टीफन नाम का आदमी घुटनों के बल बैठा था। चेहरा देखकर साफ पता लग रहा था कि इसके मां-बाप जरूर इंडिया से थे।

उसने लाश को 2 से 3 मिनट तक घुरा और फिर अपने पास खड़े दूसरे ऑफिसर को कहा।

"कहीं भी देख कर नहीं लगता इसका कत्ल हुआ है ..... हो सकता है घबराहट में आकर हार्ट फेल हो गया..... ट्रेन में इलेक्ट्रीशियन गड़बड़ हुई थी जिसमें सभी लोगों की सांसें हलक से बाहर आने को थी.... इसी चक्कर में टपक गया बेचारा!!"

"हा सर..." उस ऑफिसर ने भी स्टीफन की बात मैं अपनी बात मिलाई "साफ पता लग रहा है यह कत्ल नहीं मौत है....हमने इसके रिश्तेदारों को खबर कर दी है वह  जल्दी आ जाएंगे..."

"वेरी गुड...!! वेरी गुड..!! लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दो...." वह खड़े हुए और ट्रेन के दरवाजे के पास आकर रुक गए। फिर वापस पीछे घूमा और लाश को एक बार और देखा "वैसे यह था कौन..?" उन्होंने अपने साथ वाले ऑफिसर से पूछा जो उसके साथ साथ दरवाजे तक आ पहुंचा था।

"सतीश विजयवर्गीय..... पैशें से साइंटिस्ट था.... किसी तरह की एडवांस रोबोटिक टेक्नोलॉजी के फील्ड में काम करता था"

"ओह....!!" स्टीफन ने एक लम्बी ओह की और छलांग मारता हुआ ट्रेन से नीचे उतर गया। लाश के दिखने के बाद अभी तक ट्रेन को रवाना नहीं किया गया था। घटना से जुड़ी जितनी भी जानकारी थी उस सब का रिकॉर्ड दर्ज कर लिया। अब बस परिजनों के आने का इंतजार था जिसके बाद लाश उठाकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दी जाएगी। सर्दी अधिक थी और ऐसी सर्दी में बाहर खड़े रहना किसी के लिए भी संभव नहीं। स्टीफन वहां के एक बोगी में जाकर हाथों को मसलते हुए गर्म करने लगा।

ट्रेन के यात्रियों की पूछताछ में किसी भी यात्री ने क कोई खास गवाही नहीं दी।

उन्हें तो यह तक नहीं मालूम था कि ट्रेन में आखिर हुआ क्या। क्योंकि अंधेरे में उन्हें शिवाय लोगों की चीखों के और कुछ नहीं सुना।

थोड़े इंतजार के बाद एक 23 साल की महिला रोती हुई वहां आई और ऑफिसर से पूछने लगी.... कहां है वो... कहां है वो.... मेरे पति कहां है.....। ऑफिसर ने अपना इशारा ट्रेन के अंदर की तरफ कर दिया.... जिसके बाद उसने ना दाएं देंखा ना बांय वह सीधे उस दिशा में दौड़ पड़ी.....

लेकिन उसे लाश के पास नहीं जाने दिया गया...... और बीच में ही लाश से किसी भी तरह की छेड़खानी ना करने का हवाला देकर उस औरत को रोक लिया गया। वह दूर से ही अपने पति की लाश को देखते हुए बोली...

"वह मरे नहीं मारा गया है"

"वह मरे नहीं मारा गया है"

वह बार-बार अपने ही बात को दोहराने लगी। स्टीफन जो कि दूर बेठा यह सुन रहा था.... वह खड़ा हुआ और उस औरत के पास आया।

"आप ऐसा क्यों कह रही हो.... क्या इनकी किसी से दुश्मनी थी..."

"नहीं.."वह रोते हुए बोली।

"तो कहने का कारण?? " उन्होंने तुरंत आगे पूछा।

"मेरी अंतरात्मा... वह मुझसे कह रही है कि मेरे पति मर नहीं सकते... उनका कत्ल हुआ है" उस औरत की आंखों में आंसु थे।

"उफफफ..... इंडियन टीवी सीरियल..!" औरत की इस बात पर स्टीफन ने अपना माथा पकड़ लिया। वह अपने ऑफिसर से बोला "लाश की पहचान का मुआयना करवाकर उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दो... इसकी मौत हुई है... कत्ल नहीं"

"नहीं नहीं नहीं...!!" लेकिन उस अधेड़ उम्र की औरत ने स्टिफन की बात पूरी ही नहीं होने दी। "मैं आपसे कह रही हूं ना वह मर नहीं सकते उन्हें मारा गया है..."

"लेकिन हम यहां कुछ भी ऐसा नहीं मिला जो इस बात की पुष्टि करता हो कि उन्हें मारा गया है.. ना तो लाश पर किसी तरह का कोई निशान है.... और ना ही कोई ऐसी चीज मिली जिसके आधार पर कहा जा सके कि उनकी मौत नहीं बल्कि कत्ल हुआ है.." स्टीफन के लेहजें में इस बार गुस्सा था। ‌

"मैं इसकी जांच अपने अधिकारी से करवाना चाहती हूं...." औरत ने स्टीफन की बातों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया।

"हमें किसी तरह का एतराज नहीं.... आप जिसे चाहे जांच करवा लीजिए.... हम भी आपका पूरा सहयोग करेंगे...." इधर स्टीफन भी औरत की बात सुनने को तैयार नहीं था क्योंकि अगर देखा जाए तो पहली नजर में कहीं से भी ऐसा नहीं लग रहा था की सतीश विजयवर्गीय को मारा गया है पर पता नहीं किस आधार पर वो औरत बार बार कह रही थी कि वह मरा नहीं उसे मारा गया है....!!

कुछ दूर जाने के बाद उस औरत ने अपनी जेब से फोन निकाला और एक फोन कॉल मिलाया।

"हेलो.... क्या आप इंडिया से बात कर रहे हैं.??"
"हां" सामने से जवाब आया
"मुझे निधि से मिलना है"

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