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Thursday, June 4, 2020

THE SECRET IDENTITY-8




   
    निधि का इराक जाना
   
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    2 दिन बाद। शाम को
   
    गोवा के आर्मी एयरपोर्ट के बाहर निधि और उसके अंकल अकेले खड़े थे। निधि के अंकल ने कुछ जरूरी दस्तावेज निधि को पकड़ाए और कहा "वहां तुम्हें हमारा एक आदमी मिलेगा, 'वकार अहमद'। वह तुम्हारी मदद आगे के रास्ते के लिए करेगा। मैंने उसे तुम्हारे आने की इंफॉर्मेशन दे दी है। उसने कहा है की वह राजधानी की मस्जिद से तुम्हें पिकअप कर लेगा। मस्जिद मुख्य बाजार के बगल में ही हैं इसलिए ढूंढने में दिक्कत नहीं आएगी। किसी से रास्ता पूछ भी सकती हो।"
   
    "आप फिक्र ना करें अंकल!!" निधि ने कहा और उन्हें गले लगा लिया। इसके बाद उसने अपना सामान उठाया और एरोप्लेन में बैठ गई।
   
    तकरीबन 3 घंटे बाद रात के अंधेरे में आर्मी का एरोप्लेन बिना आवाज किए इराक की राजधानी में उड़ रहा था। वह राजधानी के किनारे पर था। ऊंचाई एक सुरक्षित सीमा पर, जहां से रडार उसे पकड़ ना पाए। थोड़ी देर बाद नीचे रेतीले टीलों को देखकर पायलट ने निधि को लैंडिंग करने के संकेत दिए। पायलट का इशारा मिलने के बाद निधि ने एक अच्छी सी जगह देखी और छलांग लगा दी।
   
    बीच रास्ते में आने पर उसने अपना पैराशूट खोल दिया और धीरे-धीरे नीचे उतरने लगी। जमीन पर गिरते ही वह फिसलते हुए संभली और बालू पर अपने पैर जमा लिए। इसके बाद जल्दी-जल्दी उसने पैराशूट को समेट कर उसे मिट्टी में गाड़ दिया। फिर वह पैदल ही राजधानी की तरफ जाने लगी।
   
    शहर में आने से पहले ही उसने अपने कपड़े बदल लिए थे और इराकी सरजमीं की वेशभूषा धारण कर ली थी। इस वेशभूषा में उसे पहचानना मुश्किल था। शहर के पास आते ही उसने भेड़े चरा रहे एक गडरिए को रोका और उससे वहां की भाषा में मुख्य बाजार जाने का रास्ता पूछा। अरबी ने उसे एक दिशा दिखा दी। जब उसके अंकल ने उसे मिशन के बारे में बताया था तब कहा था कि शहर के मुख्य बाजार में उसे एक आदमी मिलेगा जो आगे की मिशन में उसकी मदद करेगा। ‌उस आदमी का नाम वकार अहमद होगा और उसे इस बात की जानकारी भी है कि निधि वहां आ रही है। इराक  में एजेंसी से जुड़े तमाम कामकाज वकार अहमद ही संभालता है।
   
    शहर के मुख्य बाजार में आने के बाद निधि ने वहां की रौनक देखी। पूरा बाजार लोगों से भरा पड़ा था, तरह-तरह की दुकानें थी लेकिन ज्यादातर लोग या तो बच्चे थे या फिर बूढ़े। निधि ने एक दुकान पर खड़े होकर कुछ सामान‌ लिया और फिर उस दुकान वाले से मस्जिद जाने वाली गली का रास्ता पूछा। मिशन के हिसाब से दोनों की मुलाकात मस्जिद के पीछे वाली गली में होनी थी। आदमी ने निधि को मस्जिद की गली का रास्ता दिखा दिया।
   
    मस्जिद ज्यादा दूर नहीं थी इसलिए पहुंचने में वक्त नहीं लगा। वहां पहुंचती ही वह सीधे मस्जिद के पीछे चली गई और वकार अहमद का इंतजार करने लगी। लोगों की आवाजाही सब तरफ तेज थी लेकिन पीछे वाली गली में अभी तक कोई नहीं आया।
   
    तकरीबन 20 मिनट के इंतजार के बाद एक सफेद दाढ़ी वाला आदमी गली से  गुजरा। निधि ने उसे देखा पर बुलाया नहीं। वो आदमी सीधे निकल गया। तकरीबन 2 मिनट बाद वह आदमी वापस उस गली में आया। इस बार भी वह जैसे आया था वैसे ही निकल गया। निधि को यह थोड़ा अजीब लगा, उसने अपने पैरों से खंजर निकाला और उसे पीठ के पीछे छुपा लिया। बुड्ढा आदमी फिर से गली में नजर आया पर इस बार सीधे निधि के पास आ गया। निधि ने कोई हरकत नहीं की।
   
    "क्या तुम निधि हो??" सामने से उसने पूछा।
   
    "हां, और आप??"
   
    "वकार अहमद, वह आदमी जिसे तुम्हारी मदद करनी है"
   
    "लेकिन आप गली के चक्कर क्यों लगा रहे थे??" निधि ने बिना किसी झिझक सीधे पूछ लिया। वकार अहमद तकरीबन 55 वर्ष की उम्र वाला व्यक्ति होगा। उसके चेहरे पर झुर्रियां थी और आंखों की पुतलियां लगभग बाहर आई हुई थी।
   
    "यह देखने के लिए की यहां कोई हम पर निगरानी तो नहीं रख रहा" वह आगे बोला "आओ, मेरे पीछे पीछे आओ"
   
    निधि बिना किसी सवाल उसके पीछे चलने लगी। दोनों मस्जिद के आगे से निकले और मुख्य शहर से होते हुए दूसरी गली में चले गए। इस गली में तकरीबन तीन मंजिल के काफी सारे घर बने हुए थे। घर की दीवारों को मरम्मत की आवश्यकता थी।
   
    काफी सारे घरों के गुजरने के बाद वह दोनों एक तीन मंजिला घर में घुस गए जो दूसरे घरों से थोड़ा सा अलग था। इसकी दीवारें कुछ ज्यादा ही कमजोर थी। दोनों इस घर की दूसरी मंजिल में गए और एक कमरे के सामने जाकर रूक गए। वकार अहमद ने आगे बढ़कर दरवाजा खटखटाया।
   
    दरवाजा खटखटाने के बाद अंदर से किसी की चलने की आवाज आई और एक बूढ़ी औरत ने दरवाजा खोला "ओह आप आ गए" उसने सलाम कहते हुए वकार अहमद को कहा। "हां, वो लड़की भी आ गई है"  बूढ़ी औरत ने निधि को भी सलाम किया।
   
    सब अंदर आ गए। वकार अहमद ने एक कुर्सी खिसकाई और उसे निधि को बैठने के लिए दिया। निधि ने अपना लंबा-चौड़ा बुर्का उतारा और उसे साइड में रख कुर्सी पर बैठ गई। बूढ़ी औरत उसे थोड़ी तिरछी नजरों से देखा। वकार अहमद भी उसके सामने रखी कुर्सी पर बैठा और बूढ़ी औरत को कुछ खाने पीने के लिए लेकर आने को कहा। वह अभी भी निधि को घूर रही थी। वकार अहमद ने उसे दोबारा बोला जिसके बाद वह अंदर किचन की तरफ चली गई।
   
    "और.. तुम्हें यहां आने में किसी तरह की दिक्कत तो नहीं हुई??"
   
    निधि मुस्कुराई और मुस्कुरा कर कहा "जी नहीं नहीं, किसी तरह की दिक्कत नहीं हुई"
   
    "अल्लाह का शुक्र है" वकार अहमद बोले और साथ वाले कमरे के दरवाजे की तरफ देखने लगे। वहां से बूढ़ी औरत चाय और खाने के सामान के साथ लड़खड़ाते हुई आ रही थी। उसने चाय और खाने का सामान मेज पर रखा और वापस चली गई।
   
    "लो, नाश्ता करो" वकार अहमद ने निधि को नाश्ता करने को कहा और खड़े होकर खुद बाहर वाले दरवाजे की कुंडी बंद करने चलें गए।
   
    निधि ने पीछे से उन्हें शुक्रिया कहा और चाय का कप उठाकर कुर्सी पर आराम से बैठ गई।
   
    वकार अहमद ने दरवाजे की कुंडी बंद की "मुझे कैप्टन रोड ने बताया था कि तुम यहां सिर्फ कुछ दिनों के लिए आई हो, जब तुम्हारी कार्रवाई पूरी हो जाएगी तुम चली जाओगी।"
   
    "जी हां"
   
    "वैसे तो तुम्हें यहां किसी तरह का खतरा नहीं है, लेकिन आर्मी और पुलिस से बचकर रहना पड़ेगा। जंग का माहौल है तो कभी भी कुछ भी हो सकता है"
   
    "जी हां" निधि ने फिर से जवाब में सर हिलाया।
   
    "तुम अपना काम कल सुबह से शुरू कर सकती हो…. मैं तुम्हें सबसे पहले वह जगह दिखा दूंगा जहां तीनों एजेंट रहते थे। तीन में से एक एजेंट यहीं मरा है जबकि बाकी के दो एजेंट सीरिया में मारे गए थे।"
   
    "हममम"
   
    "यहां रहने वाले एजेंट को हार्टअटैक आया था, ऐसे में संभावना है कि उसे जहर दिया गया हो अब जहर किसने दिया है नहीं पता"
   
    निधि रुकी और बोली "अगर जहर दिया गया है तो क्या पता वह खाने वाली चीज में दिया होगा" उसने इस हिसाब से कहा जैसे उसे लगा कि शायद यह किस्सा आसानी से सुलझा लेगी।
   
    "हां, लेकिन वह अपना खाना खुद बनाता था” इसके बाद निधि बिल्कुल खामोश हो गई।
   
    चाय पीने के बाद वकार अहमद खड़ा हुआ और उसने एक दूसरे कमरे का दरवाजा खोला। "तुम आज रात को यहां सो सकती हो"
   
    निधि ने उठ कर कमरे की हालत देखी। यह कबाड़ से कम नहीं था। "क्या यह हमारी बेस है" उसने बड़ी हैरानी से पूछा।
   
    "हां!! हम लोग अमेरिका या ब्रिटेन में नहीं .....इराक में है.... और यहां हमें ऐसी बेस बनाने की ही इजाजत मिली है"
   
    जवाब में निधि ने कहा "ठीक है, मुझे किसी तरह की दिक्कत नहीं होगी"
   
    वकार अहमद ने एक हल्की सी मुस्कान दिखाइ और फिर निधी को वहीं छोड़ चला गया। उसके जाने के बाद निधि ने कमरे का दरवाजा बंद किया और कमरे की दूसरी चीजों को देखने लगी।
   
    वहां एक टूटा हुआ पलंग, एक पुराना सोफा, कुछ टूटी हुई कुर्सियों का ढेर और एक अलमारी थी। निधि टूटे हुए पलंग पर जाकर बैठ गई और सोचने लग गई।
   
    "बंदा तो यह भी कम नहीं…. हो सकता है यह भी साजिश में शामिल हो…. किसी पर विश्वास नहीं किया जा सकता….. निधि तुम्हें सावधान रहना होगा"
   
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