निधि का पहले एजेंट की छानबीन करना
______________________________________
चिड़ियों की चहचहाहट के साथ अगले दिन की शुरुआत हुई। दिन खुशनुमा था। आसमान में हल्के बादल थे। रेगिस्तानी इलाके में इस तरह के बादल एक सुखद एहसास देने के लिए जाने जाते हैं। वैसे भी रेतीली जमीन पर बादल कम ही देखने को मिलते हैं। तकरीबन 6:30 बजे वकार अहमद बाजार से सब्जी लेकर आया और उसे अपनी पत्नी को बनाने के लिए दे दी। इसके बाद उसने निधि के कमरे की तरफ देखा जो अभी भी अंदर से बंद था। "लगता है वह अभी भी सो रही है" उसने मन ही मन सोचा और नहाने चला गया। वकार अहमद की पत्नी ने सब्जी काटी और झौंक लगा दी। एक तरफ उसने चाय भी रख दी। जैसे ही निधि बाहर आएगी वह उसे चाय दे देंगे। आधा घंटा और बीत गया। सुबह के 8:00 बज चुके थे। निधि के लिए जो चाय बनी थी वह उन लोगों ने खुद पी ली, पर निधि अभी तक बाहर नहीं आई। इसके बाद दोनों अपना-अपना काम करने लग गए। वकार अहमद की पत्नी घर की सफाई करने में व्यस्त हो गई तो खुद वकार अहमद अखबार पढ़ने में।
इंतजार करते करते सुबह के 10:00 बज चुके थे। वकार अहमद और उसकी पत्नी को बड़ी बेसब्री से निधि के बाहर आने का इंतजार था। उन्हें लगा था कि निधि जल्दी उठ जाएगी। लेकिन नहीं!! निधि को देर तक सोने की आदत थी।
10:00 बजे के बाद अचानक दरवाजे की कुंडी खुली और निधि अंगड़ाइयां लेते हुए बाहर आई। उसे इस बात का बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि बाहर वकार अहमद और उसकी पत्नी इंतजार में उसका रास्ता देख रहे थे।
सब एक-दूसरे के आमने-सामने थे, एक अजीब सी स्थिति बन गई। वह उन्हें देख रही थी और वो निधि को। निधि ने अचानक अपने हाथ नीचे किए और वकार अहमद की सामने वाली कुर्सी पर जाकर बैठ गई।
"गुड मॉर्निंग" इन हालातों में निधि के मुंह से बस यही निकला।
वकार अहमद ने तिरछी नजरों से पहले निधि को देखा और फिर अपनी पत्नी को और कहां " जाओ जाकर इसके लिए चाय और नाश्ता ले आओ, कुछ इस्लामी कपड़े भी ले आना। अगर यह इस तरह से बाहर गई तो हम लोगों पर आफत आ जाएगी"
निधि ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई। बस एक बार अपने कपड़ों को देखा, जो हद से भी ज्यादा छोटे थे। तकरीबन आधे घंटे बाद चाय पानी और नाश्ते का काम खत्म हो चुका था।
निधि ने इस्लामी कपड़े पहने और खुद को बुरके में बंद कर लिया। वकार अहमद ने अपने पत्नी को आल्हा हाफिज बोला और कल की योजना का अनुसरण करने लगे।
उन्हें सबसे पहले इस जगह पर मरने वाले एजेंट की छानबीन करनी थी। दोनों उस एजेंट के घर के तरफ वाले रास्ते पर चल दिए।
रास्ते में वकार अहमद ने निधि को बताया की उस एजेंट को मरे हुए काफी दिन हो गए, लाश तो सरकार ने अपने कब्जे में ले ली पर उसका कमरा अभी भी वैसे का वैसा ही पड़ा था। यहां के लोगों के आलसी पन के कारण किसी ने उस कमरे की जांच नहीं की। हो सकता है वहां तुम्हें कुछ काम की चीज मिल जाए। निधि वकार अहमद की हर बात का जी में जवाब दे रही थी।
तकरीबन 10 से 15 मिनट के सफर के बाद दोनों पास के ही मोहल्ले में बनी दूसरी गली में चलते हुए नजर आए। रास्ते में कुछ जान पहचान के लोग भी मिले जो सिर्फ वकार अहमद को जानते थे। वह उन सबको खुदा हाफिज, सलाम इत्यादि जैसे शब्द कहकर बुलाता गया। निधि को यह बात थोड़ी अजीब लगी। इस आदमी की अच्छी-खासी जान पहचान है पर इसके बावजूद कोई इस पर शक नहीं करता। वह उस एजेंट को भी जानता है तो ऐसे में उससे मिलने भी आता होगा। क्या किसी का इस बात पर शक नहीं गया की यहां एक एजेंट भी रहता है। छोड़ो, मैं भी फालतू में ऐसे ही सोच रही हूं। निधि ने कहा और अपने दिमाग को आराम दे दिया।
कुछ देर और रास्ते में चलने के बाद निधि ने कुछ सवाल वकार अहमद से पूछने शुरू कर दिए। उसने वकार अहमद से पहले उनके खुद के काम के बारे में पूछा। जिसके जवाब में वकार अहमद ने बताया कि उसका काम फील्ड प्लानिंग का था। वह यहां आए हुए एजेंट की मदद करने का काम करता है। उनके खाने-पीने से लेकर सोने तक, प्रत्येक चीज की जिम्मेदारी उसकी होती है। उसको पैसे, जरूरी हथियार, दस्तावेज यह सब लाने का काम वही करता है।
निधि ने दूसरा सवाल पूछा, जिस एजेंट की मौत हुई है क्या उसकी किसी से दुश्मनी थी। कोई ऐसा जो उस पर शक कर रहा हो??
"नहीं" वकार अहमद ने चलते हुए जवाब दिया। "वह एजेंट इतना सक्रिय नहीं था। ज्यादातर काम कमरे में ही करता था। उसके तो खाने-पीने का सामान भी मैं ही लेकर आता था। स्वभाव मैं फ्रेंडली था, इसलिए उसने किसी से लड़ाई भी मोल नहीं ली"
यह बात भी हैरानी वाली थी। किसी से दुश्मनी नहीं, पर इसके बावजूद किसी ने उसे मार दिया। निधि ने मन ही मन सोचा और उसके बाद आगे का सवाल पूछा "क्या दूसरी एजेंसियां उसके पीछे पड़ी थी??"
"यहां दूसरी एजेंसी के लोग सक्रिय ही नहीं" वकार अहमद ने जवाब दिया” दूसरी एजेंसियों के सारे प्रोजेक्ट बंद हो चुके हैं। खुफिया सूत्रों से पता चला है की अमेरिका भी पहले इस केस में इंवॉल्व था पर उसने भी अब अपने हाथ पीछे खींच लिए हैं"
"सरकारी एजेंसी से कोई दुश्मनी??" निधि ने अंदेशा जताया।
"इराक की सरकारी एजेंसी बहुत ढीली चल रही है, अगर उनमें इतना दम होता तो वह हमें क्यों हायर करते"
"यह बात भी सही है" निधि ने कहा और फिर आगे बोली "इराक की सरकारी एजेंसी से कोई भी अगर दुश्मन नहीं तो सीरिया की एजेंसी के लोग? वह तो पक्का दुश्मन होंगे। क्या पता उन्हें पता चल गया हो कि हम उनके देश के प्रधानमंत्री को मारना चाहते है, और उन्होंने हम पर सर्जिकल स्ट्राइक कर दिया"
"अगर ऐसा होता तो हमारे बाकी के एजेंट भी मारे जाते। सीरिया में अभी काफी सारे एजेंट सुरक्षित है। उन पर किसी तरह का कोई खतरा नहीं आया। "
"मतलब आपका कहना है कि ना तो बाहरी एजेंसी का इसमें हाथ है और ना ही अंदरूनी एजेंसी का, कोई तीसरा ही है जो उसकी मौत का कारण बना" निधि ने सभी बातों का निष्कर्ष निकालते हुए कहा।
"आमीन, यहां के हालात वैसे नहीं जैसे आप सोच रही हैं। बिना जान पहचान के दूसरे देश के पक्षी भी यहां पर नहीं मार सकते, इन्सान तो बहुत दूर की बात है। हालात और चीजें यही बता रही की हमारे किसी अन्दर के आदमी का ही हाथ है। हो सकता है चंद रुपयों के लिए उसने अपना ईमान बेच दिया हो..... जिसके बाद यह काम किया "
"पर यहां अन्दर का आदमी है कौन..?? आप?? पर आप उसे क्यों मारेंगे"
वकार अहमद के कदम अचानक रूक गए। उसने निधि को देखा और काफी देर तक देखा। फिर वापिस चलने लगा। "सीरिया में हमने कुछ एजेंट भेजे थे। अभी नहीं बल्कि कुछ साल पहले.. तकरीबन छह एजेंट थे.... वह लोग वहां 7 साल से काम कर रहे हैं। जब उन्हें भेजा था तब उनकी उम्र 13 से 14 साल के आसपास थी.....हमारा मकसद था कि उन्हें वहां की नागरिकता मिल जाए और वह लोग वहां की सेना में भर्ती हो जाए। अक्सर एक एजेंसी अलग-अलग देशों में इस तरह के खुफिया एजेंट भेजती रहती है, जो उन्हें शेडी देने का काम करते हैं। उस समय हमें बिल्कुल नहीं पता था कि आगे चलकर हमें इस तरह के मिशन पर काम करना पड़ेगा। मुझे शक है कि उनमें से कुछ एजेंट सीरिया के साथ मिल चुके हैं।"
सीरिया में!! लेकिन उन्हें कंट्रोल कौन कर रहा है। जैसे यहां की कमान आपके हाथ में हैं, वैसे ही सीरिया में स्पेस एकेडमी की कमान किसके हाथों में हैं"
"है एक कमीना इन्सान, धोखा उसकी रग रग में भरा है। ' कमांडर विनम्र' वह एक नम्बर का कमीना इन्सान है"
" विनम्र!!" निधि ने आश्चर्य से कहा।
"तुम्हारे लिए तो यही अच्छा है कि तुम उसके बारे में ना जानो, वह किसी का भी सगा नहीं, उसने कई बार हमारे लोगों को धोखा दिया है"
"पर इसके बावजूद वह वहां का कमांडर है!! बात कुछ हजम नहीं हुई"
"उसकी नेतृत्व क्षमता जबरदस्त है, सीरिया में कोई उसका विद्रोह करने का दम नहीं रखता, बड़े-बड़े नेताओं के साथ उसका उठना बैठना है, सेना में भी पहुंचे हैं। अगर किसी ने विद्रोह किया तो वो एक पल नहीं लगाएगा उन्हें खत्म करने में"
"लेकिन वह काम किसके लिए करता है??"
"कोई नहीं जानता, एक पल लगता है वह हमारे साथ हैं पर अगले ही पल वह सीरिया का साथ दे रहा होता है। सीरिया में वह सेना की एक टुकड़ी का कमांडर है। यह कमांडर नाम भी इसीलिए पड़ा है।"
दोनों बातें करते-करते एजेंट के कमरे तक पहुंच चुके थे। कमरे के सामने पहुंचते ही उन दोनों की बातें रुक गई। वकार अहमद ने इशारा कर बताया की एजेंट का कमरा ऊपर की तरफ है। ऊपर जाने के लिए सीढ़ियां थी। वकार अहमद वही सीढ़ीयों पर रुका और निधि को अकेले आगे जाने के लिए कहा।
सीढ़ियों की मदद से निधि कमरे में पहुंची और दरवाजा खोला। कमरे में ज्यादा कुछ नहीं था। एक बेड था। एक अलमारी थी। एक एलसीडी स्क्रीन और एक कपड़े रखने वाली अलमारी। इसके अतिरिक्त एक जूते रखने वाला बेंच था।
निधि ने सबसे पहले कमरे को अपनी आंखों से देखा। फिर धीरे-धीरे वहां की चीजों को उठाकर देखने लगी। उसने एलसीडी स्क्रीन के पीछे का हिस्सा, जूतों वाले मेज के आसपास का हिस्सा, यहां तक कि जूतों के अंदर की चीजें भी देखी।
इसके बाद वह अलमारी की तरफ बढी और अलमारी को खोला। उसमें कपड़े और कुछ खाली कागज थे। निधि ने वहां की हर एक चीज निकाल कर चेक की। कहीं भी कुछ संदिग्ध नहीं था। अलमारी देखने के बाद उसने अलमारी के कोने भी देखें, अलमारी के ऊपर की जगह की भी तलाशी ली। अंत में उसने बेड के बिस्तर को उठाकर बेड के नीचे देखा। "यहां तो कुछ भी ऐसा नहीं जो काम आए" पूरा कमरा देखने के बाद निधि कमरे से बाहर आ गई। बाहर कुछ गुलदस्ते पड़े थे। निधि ने एक नजर उन गुलदस्तों को भी उठाकर देखा। "इनमें भी कुछ नहीं" फिर वह सीढ़ियों से नीचे आई और आकर वकार अहमद के पास खड़ी हो गई। "यहां तो ऐसा कुछ नहीं मिला जिससे कोई सुराग मिलें"
"मैंने तो पहले ही कहा था" सामने से वकार अहमद बोला " यहां जो भी था उसे मारने वाला पहले ही ले गया होगा, चलो अब चलें"
दोनों वापिस जाने के लिए मुड़ गए।
लेकिन थोड़ी दूर जाने के बाद बीच रास्ते में निधि के मन में पता नहीं क्या विचार आया, वह तेजी से कूदी और बोली” अंकल, आप चलो.. मैं अपने आप आ जाऊंगी। कुछ रह गया है जिसकी मुझे जांच करनी है"
"लेकिन मैं तुम्हें ऐसे अकेले नहीं छोड़ सकता" सामने से वकार अहमद ने कहकर उसे रोकने की कोशिश की।
लेकिन निधि नहीं मानी "आप मेरी चिंता मत कीजिए.... बस में एक डेढ़ घंटे में ही आ जाऊंगी"
इसके बाद वह दौड़ कर वापस एजेंट के कमरे की तरफ चली गई। पीछे से वकार अहमद उसे देखता रह गया। "पता नहीं इस लड़की को यहां क्यों भेजा गया है, इसकी तो हरकतें भी बच्चों जैसी है....." फिर मुड़कर अपने रास्ते लग गया।
निधि तेजी से कमरे में गई और जाकर एक बार फिर से अलमारी खोली। फिर वहां के तमाम खाली कागज पत्र निकाले और उसे बेड पर गिरा लिया।
"स्पेस एकेडमी के एजेंट हमेशा अपने तेज दिमाग के लिए जाने जाते हैं। किसी भी मिशन को पूरा करने से पहले उनका एक बैकअप प्लान होता है.... और उसे वह लोग छुपा कर रखते हैं" निधि बोलने के साथ-साथ एक एक कागज को गौर से देख रही थी।
इसके बाद उसने ढेर सारे कागजों में से दो कागज छांटें और उन्हें धूप की तरफ करके देखा। वह खाली थे पर इसके बावजूद निधि पता नहीं क्यों खुश हो रही थी। "एकेडमी में हमें चीजों को छुपाना सिखाया जाता है...." उसने कहा और बाहर गमलों की तरफ आ गई। फिर गमलों की मिट्टी नीचे गिराई और कुछ हिस्सा अपने हाथ में लेकर वापस अंदर आ गई। मिट्टी का हिस्सा उसने दूसरे कागज पर रखा और कमरे में पानी ढूंढने लगी। "कागज पर चीजों को छुपाने के लिए हमें खास तकनीक का प्रयोग करते हैं..... और वह तकनीक है केमिकल वाली लिखाई..... इस लिखाई में पहले एक केमिकल से कागज पर चीजें लिख ली जाती है...और जब उस पर दूसरा केमिकल गिराया जाता है तो वह लिखी हुई चीजें दिखाई देने लगती है"
पानी मिलने के बाद निधि ने उसे गमले की मिट्टी में मिला दिया। मिट्टी और पानी दोनों ने मिलकर कागज को मटमैला कर दिया। निधि ने वह कागज़ उठाया और उसे बाकी के दो छांटें हुए कागजों से रगड़ने लगी। फिर उसे धूप की तरफ करके देखा.... उस पर कुछ शब्द उभर कर आ गए थें। वह कुछ आड़ी टेढी लकीरे थी।
"शाबाश निधि" निधि के चेहरे पर एक अजीब ही खुशी थी। मानो उसके हाथ कोई खजाना लग गया हो। उसने अपनी जेब से मोबाइल निकाला और दोनों कागजों का स्क्रीनशॉट ले लिए। फिर कमरे की चीजों को वैसे ही करने लगी जैसे वह पहले थी। जो कागज वह खराब कर चुकी थी, उसने उन सभी कागजों को समेटा और अपने हाथ में ही पकड़ लिया। बेड की चादर, अलमारी के कपड़े... सब के सब जो के त्यों ही सजा दिए।
अंत में वह बाहर आ गई, उसके हाथ में जो कागज के टुकड़े थे उसने वह वहां की नाली में फेंक कर उन्हें आगे बहा दिया। यहां तक का काम तो हो गया... पर अभी आगे का काम बाकी था। इन लकीरों का मतलब क्या है.... यह चीज भी समझनी है।
__________________________________________________________________________

No comments:
Post a Comment