सिरिया के प्रधानमंत्री की सालगिरह,
निधी का उसे हाईजेक करना,
वकार अहमद की मुलाकात, उसका बचकर निकल जाना
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राजधानी।
3 दिन पहले ही राजधानी में मिलिट्री की भारी भरकम टुकड़ियों का आना शुरू हो गया था। चप्पे-चप्पे पर कड़ी सुरक्षा थी। समारोह स्थल के आसपास की बिल्डिंग सैनिकों ने पहले ही अपने कब्जे में ले ली थी। अंदर आने वाले लोगों के दस्तावेज खास तरीके से चेक किए जा रहे थे। आज के समारोह में प्रधानमंत्री अपने सालगिरह को खास बनाना चाहते थे। तानाशाही शासक होने के कारण उनका जनता से जुड़ाव भी आवश्यक था, इसलिए उन्हें इससे अच्छा मौका नहीं मिला। आज सालगिरह के बहाने वह जनता को संबोधित करेंगे, और इस चीज की उम्मीद भी है कि वह इराक से अपने संबंधों को लेकर अपनी बात जनता के सामने रखें। राजनीति में अक्सर नेता के साथ जनता का होना आवश्यक है अन्यथा कभी भी कुछ भी हो सकता है।
सुबह 6:00 बजे से ही लोगों का आना-जाना शुरू हो गया था। 11:00 बजे प्रोग्राम की शुरुआत होनी थी। निधि और विनम्र भी अपनी तैयारिया करने में लगे हुए थे। उन्हें अपनी योजना के अनुसार काम करना था।
तकरीबन 9:30 बजे निधि आईने के सामने अपनी आंख के नीचे बने घाव को देख रही थी। वह अब थोड़ा हल्का हो चुका था।
"क्या हुआ...??" विनम्र ने निधि से पूछा।
"कुछ नहीं... बस घाव के निशान देख रही थी।"
"डोंट वेरी, वक्त हर घाव के निशान को भर देता है..." विनम्रने कहा। निधि उसकी तरफ मुड़ी "कुछ घाव वक्त भी नहीं भर सकता, योजना पर काम कैसा चल रहा है...." निधि ने विनम्र से आगे पूछा
"सब तैयार है, प्रधानमंत्री तक पहुंचने में तुम्हें कोई दिक्कत नहीं आएगी। इसके बाद आगे का काम तुम्हारा है। सुरक्षा सख्त है.... इसलिए तुम किसी तरह का हत्यार नहीं लेकर जा सकती.... ना ही कोई नुकीली चीज.... तुम्हें उसे दूसरे तरीके से खत्म करना होगा"
"हमममम" निधि ने गहरी सांस ली और जवाब दिया।
"चलो, बाहर जीप तुम्हारा इंतजार कर रही है" विनम्र कहकर बाहर जीप की तरफ निकल गया। निधि भी आ गई।
ठंडी-ठंडी हवा चल रही थी, रेगिस्तानी इलाके में सड़क पूरी तरह से साफ थी। ना तो सामने से कोई साधन आ रहा था ना ही पीछे से। निधि ने एक भूरे रंग का बुर्का पहन रखा था जो यहां की पहचान है। विनम्र ने अपनी मिलिट्री वाली ड्रेस पहनी थी। हवा के थपेड़े उन दोनों के चेहरों पर आकर टकरा रहे थे। इन्हीं के साथ निधि अपनी कुछ पुरानी यादों में खोई हुई थी।
विनम्र ने उसका कंधा झकझोरा तो निधि ख्यालों से बाहर आई। "क्या हुआ।।। क्या सोच रही थी"
निधि मुस्कुराई "कुछ नहीं, ऐसे ही कुछ पुरानी यादें"
"इंसान को अक्सर वक्त के हिसाब से खुद को बदलना पड़ता है, वक्त इंसान को हमेशा आगे निकलने के लिए कहता है ऐसे में पुरानी यादों में उलझ कर रहना अच्छी बात नहीं"
निधि ने गर्दन हिलाकर संतुष्टि जताई। दोनों लंबे रेगिस्तानी सफर से निकलकर राजधानी में प्रवेश कर रहे थे। राजधानी की सड़क शुरू होते ही भारी भरकम भीड़ सड़क के दोनों तरफ नजर आ रही। उन्हें रोकने के लिए सैनिक भी खड़े थे।
समारोह स्थल के ठीक आगे जाकर विनम्र ने गाड़ी पार्किंग में पार्क की और निधि के साथ उनके ऑफिस की तरफ निकल गया। रास्ते में आने वाले सैनिकों विनम्र को सलूट कर रहे थे। इन सबके बीच निधि चुपचाप उसके साथ चल रही थी। ऑफिस में जाने के बाद विनम्र ने दरवाजा खोला और निधि को अंदर जाने के लिए कहा। यहां प्रधानमंत्री की प्रेस कॉन्फ्रेंस होनी थी, और यहीं रिपोर्टर आगे के प्रोग्राम तक प्रधानमंत्री को कवर करेंगे। निधि ने एक माइक पकड़ा और उन रिपोर्टर के बीच जाकर बैठ गई। विनम्र वही एक सीट के बगल में जाकर खड़ा हो गया, जहां प्रधानमंत्री को आकर बैठना था।
दोनों एक दूसरे को देख रहे थे लेकिन सिर्फ आंखों से। चारों और रिपोर्टरों की तू तू मैं मैं का शोर हो रहा था। जल्द ही सारा शोर प्रधानमंत्री के आने के साथ ही खत्म हो गया। सभी रिपोर्टर खड़े हुए और प्रधानमंत्री का अभिवादन किया। प्रधानमंत्री अपनी कुर्सी पर बैठा और रिपोर्टर को एक-एक कर सवाल पूछने के लिए कहा।
अलग-अलग रिपोर्टरस ने अलग-अलग सवाल पूछे। ज्यादातर सवाल पहले से ही डिसाइड कर लिए गए थे, क्योंकि उनके तानाशाही राज में मीडिया पर पूरा नियंत्रण सिर्फ उन्हीं का था। सवालों में किसी ने पूछा " आप जनता से कितना प्यार करते हैं??" तो किसी ने पूछा "जनता आपको क्यों नकारती है" और कुछ लोग पूछ रहे थे "क्या आप आने वाले समय में इलेक्शन करवाएंगे" इन सबके बीच निधि ने किसी तरह का सवाल नहीं पूछा। वह खामोश थी क्योंकि अगर वह सवाल पूछती तो सबके पैरों तले जमीन खिसक जाती। उसके मन में यही था की "आने वाले समय में उनकी राजनीति को लेकर क्या समझ है?? वह अपना देश पर राज करना चाहते हैं या इस विश्व पर ??" वैसे भी विश्व को जीतने की होड़ दुनियाभर के तमाम नेताओं में मची रहती है, सिकंदर ने भी इसी पीछे अपनी जान गवाई और हिटलर ने भी। लेकिन यह भुख है कि कभी मिटती ही नहीं।
सवाल-जवाब का सिलसिला खत्म हुआ, प्रधानमंत्री खड़े हुए और जनता का अभिवादन करने के लिए मंच की तरफ चले दिए। विनम्र भी उनके पीछे-पीछे मंच की तरफ चला गया। वहां खड़े रिपोर्टरों को मिलिट्री ने कवर किया और एक-एक कर प्रधानमंत्री से कुछ दूर रखी कुर्सियों पर जाकर बिठा दिया। यहां से उन्हें प्रधानमंत्री के अभिवादन को सुनना और रिकॉर्ड करना था। टीवी पर प्रसारण भी यहीं से होगा। निधि के पास मौका तो था कि वह प्रधानमंत्री पर हमला कर उसे खत्म कर दे, लेकिन इन हालातों में ऐसा बेवकूफी से भरा कदम उठाना ठिक नहीं था।
प्रधानमंत्री ने जनता को संबोधित किया।
"मेरे प्यारे देशवासियों, मुझे खुशी है... इस शानदार समारोह पर आप सब यहां एकत्रित हुए। आप लोगों का यह प्यार और देशभक्ति मुझे जीने का सबक देती है। पूर्वोत्तर देशों के हिंसक अत्याचारों के बावजूद हम लोग अपने पैरों पर खड़े हैं। पता नहीं कितने देश आए जिन्होंने अपनी मनमर्जी हम पर चलाई लेकिन हम हरगिज़ नहीं झुके। अपने हक की लड़ाई करना हमारे रगो में हैं, हमारे पूर्वजों ने हमें सिखाया था कि चाहे कुछ भी हो जाए लेकिन अपना हक किसी को मत देना। वैसे तो यह मेरी सालगिरह का समारोह, ऐसे में यह बात करना उचित नहीं, लेकिन जिस तरह का माहौल बना हुआ है मुझे यह बात करनी ही पड़ेगी। आज बॉर्डर पर जंग का माहौल है। इराक की सेना मुंह फाड़ हमारे देश की तरफ देख रही हैं। इस बात का भी फैसला करना मुश्किल हो रहा है कि पता नहीं कब वह दिन आएगा जब जंग शुरू हो जाए। एक बार अगर जंग शुरू हो गई तो दूसरे देश भी इस में कूद जाएंगे। हम सब तीसरे विश्वयुद्ध की ओर बढ़ रहे हैं, यह तीसरा विश्व युद्ध शक्ति को दिखाने का नहीं बल्कि शक्ति को आजमाने का विश्व युद्ध होगा। सभी देश अपनी अपनी शक्तियां छोटे और कमजोर देशों पर आजमायेंगे। कोई परमाणु बम से हमला करेगा, तो कोई हाइड्रोजन बम से। किसी के पास न्यूक्लियर वेपन होंगे तो किसी के पास न्यूक्लियर टैंक। हम सब एक कभी न खत्म होने वाली जंग की तरफ बढ़ रहे हैं, ऐसे में आप लोग क्या चाहते हैं कि मैं सत्ता से हट जाऊं। बताइए, आप क्या चाहते हैं कि मैं इस देश की भागदौड़ एक ऐसे इंसान के हाथ दे दूं जिसे देश संभालना ही नहीं आता। ( अपने विपक्ष के बारे में बात कर रहे हैं) हमारे दुश्मन हमारे सर पर खड़े हैं और आप लोग चुनावों के बारे में सोच रहे हैं। अगर चुनाव हो जाता है तो दूसरे देश इसका फायदा उठाएंगे, हो सकता है वह हमला भी कर दे। बिना आर्डर के हमारी सेना भी आगे नहीं बढ़ेगी, यह पूरा देश खत्म हो जाएगा। मैं ऐसा हरगिज़ नहीं होने दूंगा, मैं लुइस इल्लल्लाह जब तक जिंदा हूं तब तक सीरिया की आन और शान बनाए रखूंगा। अल्लाह हू अकबर, अल्लाह हू अकबर"
इसके बाद यह नारे चारों तरफ गूंजने लगे। प्रधानमंत्री ने अपना संबोधन खत्म किया और कई सारे सुरक्षा कर्मचारियों के साथ वहां से निकल गए। निधि और रिपोर्टर भी उनके पीछे-पीछे थे। दूसरे लोगों से नजर बचाकर निधि उन रिपोर्टरों से अलग हुई और एक कोने में जाकर अपना बुर्का उतार दिया। बुर्के के नीचे उसने मिलिट्री वाली वर्दी पहन रखी थी, और यह बात विनम्र को भी नहीं मालूम थी। मिलिट्री की वर्दी में आने के बाद उसने अपने बालों को समेटा और उसे बाधं कर उस पर कैप लगा ली। उसने अपनी वेशभूषा इस तरह कर ली थी कि जैसे वह उन्हीं की मिल्ट्री का हिस्सा है। इस बात से स्पष्ट होता है कि उसके इरादे कुछ और ही है।
अपनी वेशभूषा बदलने के बाद वह फिर से प्रधानमंत्री के काफिले के पीछे हो गई। उसने रिपोर्टरों वाली लाइन छोड़ी और सीधे जाकर प्रधानमंत्री के सुरक्षा कर्मचारियों में शामिल हो गई। वह अब उनके साथ साथ चल रही थी। प्रधानमंत्री के सुरक्षा की जिम्मेदारी विनम्र और युसुफ (उसको ऑर्डर देने वाली इंसानों) के हाथ थी। मतलब अगर कुछ भी ऊपर नीचे होता है तो उन्हीं लोगों को देखना था। विनम्र चारों तरफ नजर रखे हुए था। निधि उससे ठीक 3 सैनिकों की दूरी पर उसके साथ साथ चल रही थी। विनम्र ने निधि को देख लिया। वह देखते ही समझ गया निधि क्या करना चाहती हैं, लेकिन वह कुछ कर नहीं सकता था। निधि को रोका तो वह पकड़ी जाएगी, और अगर नहीं रोका तो शायद प्रधानमंत्री की जान पर खतरा आ जाएगा। वह चुपचाप काफिले के साथ साथ चलता रहा, आसपास नजर रखने की बजाय उसने निधि पर निगाहें पेनी कर दी। निधि प्रधानमंत्री के सेफ्टी सिस्टम को हाईजैक कर चुकी थी, वो भी सिर्फ और सिर्फ विनम्र के कारण।
सब आगे चलकर अलग अलग गाड़ियों में बैठने लगे। प्रधानमंत्री के साथ रहने वाले दूसरे ऑफिसर पीछे की गाड़ी में बैठे। निधि, विनम्र और युसुफ तीनों एक साथ प्रधानमंत्री के साथ उनकी गाड़ी में। उनके साथ दो लोग और थे। दूसरे लोगों को लग रहा था कि निधि विनम्र के साथ हैं, और वह उसकी खासम खास है इस वजह से वह साथ में चल रही है, अन्यथा किसी भी अनजान आदमी की इतनी हिम्मत नहीं होती कि वह प्रधानमंत्री के इतने करीब पहुंच पाए। वहीं विनम्र निधि को रोकने की कोशिश इसलिए नहीं कर रहा था क्योंकि अगर उसने रोका तो वह लोग उसे पकड़ लेंगे।
गाड़ियों का काफिला सड़क पर बढ चला। यह काफिला अब आगे चलकर प्रधानमंत्री के ऑफिस पर ही जाकर रुकेगा। गाड़ी के अंदर निधि युसूफ और विनम्र सीट के एक तरफ थे जबकि प्रधानमंत्री ठीक उनके सामने वाली सीट पर। उनके साथ के बाकी दो आदमी प्रधानमंत्री के अगल-बगल बैठे थे। गाड़ी काफी लंबी थी पर इसके बावजूद उसके अंदर सिर्फ 6 लोगों के बैठने की व्यवस्था थी। एक सीट ड्राइवर के पास खाली थी, जहां बैठने वाले व्यक्ति ड्राइवर और उसकी गतिविधियों पर नजर रखता था। ड्राइवर को आदेश होते हैं कि चाहे कुछ भी हो जाए, प्रधानमंत्री की गाड़ी कभी भी रास्ते में नहीं रुकनी चाहिए।
गाड़ी रास्ते पर आगे चलीं जा रहीं थी। रास्ते में ही प्रधानमंत्री ने युसुफ से आगे की बातें शुरू कर दी।
"और बताओ यूसुफ.... काम कैसा चल रहा है। साइंटिस्ट के एक्सपेरिमेंट काम आएंगे भी या नहीं" लुईस इल्लल्लाह ने साइंटिस्ट के कामकाज को लेकर अपनी बात शुरू की।
"जी सर!! सब कुछ सही चल रहा है, उसने एडवांस हथियार बनाना शुरू कर दिया है वह भी उच्च स्तर के....अगर वह अपनी कला का इसी ढंग से प्रयोग करता रहा तो हमें विश्व विजेता बनने से कोई नहीं रोक सकता"
"बहुत खूब" प्रधानमंत्री ने मुस्कुराकर एक खुशी वाली मुस्कान दिखाई। "और विनम्र.. तुम बताओ .. तुम्हारा काम कैसा चल रहा है... मैंने तुम्हें जो थंडर लाइन ढूंढने का काम दिया था वह हुआ या नहीं" प्रधानमंत्री ने विनम्र से पूछा।
विनम्र दुविधा में पड़ गया, आखिर वह इस सवाल का क्या जवाब दें, अब तो वह चाह कर भी थंडर लाइन उन्हें नहीं दे सकता था। उसने जवाब दिया "बस सर, कुछ दिन और...."
प्रधानमंत्री ने उसे भी एक भीनी सी मुस्कान दिखाई और फिर वह निधि की तरफ देखने लगे। इससे पहले उन्होंने निधि को नहीं देखा था इसलिए निधि को देखकर उन्होंने पूछा "और आप मोहतरमा!! आपका क्या परिचय हैं"
विनम्र यह सुनते ही बीच में बोल पड़ा। "यह मेरे साथ आई है, स्पेशल बॉडीगार्ड है...."
"ओह" प्रधानमंत्री विनम्र की तरफ देख कर बोले। "इंशा अल्लाह.... आजकल औरतें भी देश की सेवा में अपना अच्छा खासा योगदान दे रही है" और फिर उन्होंने निधि की तरफ देखकर उसे भी एक हल्की मुस्कान दी। "तुम्हारे पापा क्या करते थे" उन्होंने निधि से पूछा।
"जी वो भी आर्मी में थे" निधि ने तुरंत बिना किसी हिचकिचाहट के जवाब दे दिया।
"कौन सी पोस्ट...." लेकिन बीच में ही युसुफ बोल पड़ा। हालांकि किसी को शक नहीं हुआ था, और यह जो सवाल पूछे जा रहे थे वह सामान्य थे। पर अगर यहां निधि किसी भी तरह की गलती करती हैं तो संभव था, वह आसानी से पकड़ी जाएगी। निधि यूसुफ के सवाल पर उसकी तरफ मुड़ी और जवाब दिया "उनकी कोई पोस्ट नहीं थी..... वह सिर्फ एक सोल्जर थे"
"क्या बात है!!" प्रधानमंत्री यह सुनकर और खुश हो गए "एक सोल्जर की बेटी होकर तुमने अपनी लगन और मेहनत से कितनी तरक्की की... माशा अल्लाह.... भगवान तुम्हें लंबी उम्र दे"
इसके बाद आगे कोई सवाल जवाब नहीं हुआ। कुछ देर तक गाड़ी में सन्नाटा छाया रहा। प्रधानमंत्री अपने साथ के लोगों से हल्की फुल्की बातें करने लगें, देश की अर्थव्यवस्था और बदलते हालातों को लेकर। लेकिन अचानक उनके फोन पर एक मैसेज आया।
प्रधानमंत्री ने तुरंत उस मैसेज की तरफ देखा और फिर गाड़ी के साथ वाले ड्राइवर को वायरलेस पर मैसेज दिया "अरे सुनो, यह तिरिसका जेल का टावर किस तरफ है..."
"जी सर यही पास में है" ड्राइवर के साथ वाले आदमी ने जवाब दिया।
"अच्छा ऐसे करो.... गाड़ी उस तरफ घुमा लो" प्रधानमंत्री ने उसे आदेश दिया। निधि और विनम्र यह सुनकर सख्ते में आ गए। जरूर फोन पर आने वाला मैसेज वकार अहमद का होगा, और उसी ने प्रधानमंत्री से संपर्क कर उन्हें वहां आने के लिए कहा होगा। विनम्र ने निधि पर रखने वाली नजर और तीखी कर दी। अब यहां से उसे हर पल सावधानी रखना जरूरी था.....। प्रधानमंत्री की गाड़ी घूमने के साथ-साथ उनके गाड़ी को दूसरा काफिला भी घूम गया। सब अब तिरिसका जेल नाम की जगह की ओर जा रहे थे। प्रधानमंत्री के काफिले में चलने वाली कुल गाड़ियों की संख्या छह थी। एक हेलीकॉप्टर भी था जो उन गाड़ियों के ऊपर उड़ रहा था।
निधि गहरी सांस लेकर खुद को नए हालातों के लिए तैयार करने लगी, आसपास धूल मिट्टी तो उड़ ही रही थी। निधि ने हल्के से खांसने का बहाना किया और मुंह पर रुमाल बांध लिया। वैसे धूल मिट्टी कांच के बाहर उड़ रही थी पर वह काफी ज्यादा थी, जिस वजह से ऐसे प्रतीत हो रहा था जैसे वह अंदर आ रही है। निधि ने इस स्थिति का फायदा उठाया। जल्द ही गाड़ी प्रधानमंत्री के बताए पते पर थी। गाड़ी के बाहर रुकते ही एक आदमी कंबल ओढ़े तेजी से उनकी तरफ आने लगा। उसे आता देख पीछे की गाड़ियों से लोग उतरे और तुरंत प्रधानमंत्री की गाड़ी को घेर लिया। लेकिन अंदर से प्रधानमंत्री बोल पड़े "आने दो आने दो.... उसे आने दो। वह अपना ही आदमी है" प्रधानमंत्री के इस आदेश के बाद कुछ लोगों ने उसकी तलाशी ली और उसका कंबल लेकर रख लिया। फिर उन्हें प्रधानमंत्री की गाड़ी के अंदर जाने दिया। वह वकार अहमद ही था। गाड़ी के अंदर जाते ही उसने प्रधानमंत्री को असलाम वालेकुम कहा और ठीक विनम्र के बगल में बैठ गया। गाड़ी फिर से चल पड़ी। अंदर एक-एक कर उसने बाकी के लोगों को भी असलाम किया..... निधि को भी। पर निधि का चेहरा ढका हुआ था जिस वजह से वह उसे पहचान नहीं पाया। वैसे भी उसके दिमाग में निधि के गाड़ी में होने का विचार बिल्कुल नहीं था। वकार अहमद ने गाड़ी में कुछ देर सांस ली और फिर वह प्रधानमंत्री की तरफ देखकर बोले।
"मुबारक हो मेरे आका, आपको जिस चीज की तलाश थी वह मिल चुकी है"
"क्या" यह सुनकर प्रधानमंत्री की आंखों में एक अलग ही चमक आ गई। वहीं निधि और विनम्र इसके उल्ट, उनकी आंखों की चमक क्षीण पड़ गई।
"हां मेरे आका.... मुझे थंडर लाइसं मिल चुकी है" वकार अहमद ने अपनी जेब में हाथ डाला और मोबाइल निकाल लिया।
"यह तो बहुत खुशी की बात है.... तुमने आज मेरा दिल खुश कर दिया वकार " प्रधानमंत्री ने अपने दोनों हाथ हवा में फैलाकर एक अलग ही अंदाज दिखाया। विनम्र ने अपने हाथ की मूठियां भींच ली, लेकिन वकार अहमद के लिए नहीं बल्कि निधि के लिए। निधि जरूर यहां पर कोई कदम उठाएगी। वकार अहमद ने फोन निकाला और उसे प्रधानमंत्री की तरफ बढ़ा दिया.....प्रधानमंत्री ने अपना हाथ फोन लेने के लिए आगे बढ़ाया ...लेकिन बीच में गाड़ी को एक झटका लगा और फोन नीचे गिर गया।
निधि और विनम्र दोनों एक साथ फोन को उठाने के लिए नीचे झुके, लेकिन उनके साथ साथ वकार अहमद भी नीचे झुक चुका था। तीनों नीचे झुके हुए थे... और तीनों के हाथ एक साथ फोन की तरफ थे। निधि ने तेजी दिखाई और फोन उठा लिया। पर इसी दौरान उसके चेहरे का रुमाल उतर गया। वकार अहमद ने निधि की शक्ल देखी और वह देखते ही पहचान गया कि वह निधि है, उसके मुंह से यकायक निकला .... "तुम और यहां....!!!"
उसके आश्चर्य की सीमा नहीं थी। हालात हद से बाहर हो चुके थे......। निधी ने फोन तुरंत अपने कब्जे में लिया और रिवॉल्वर निकालकर उस पर तान दी। विनम्र ने भी तुरंत अपनी रिवाल्वर निकाली और उसे निधि की तरफ कर दिया। युसूफ और प्रधानमंत्री यह सब देख रहे थे, उनके पल्ले कुछ नहीं पड़ रहा था कि आखिर हो क्या रहा है। प्रधानमंत्री ने पूछा "यह सब क्या है?? और तुम लोग यह क्या कर रहे हो"
निधि का पिस्तौल वकार अहमद की तरफ था। विनम्र का निधि की तरफ.... वकार अहमद बोला "यह इंडिया की खुफिया एजेंट है.... और यहां आप को मारने के लिए आई है" यह सुनते ही युसूफ और प्रधानमंत्री के बगल के लोग तुरंत सख्ते में आए और प्रधानमंत्री के इर्द-गिर्द हाथों का घेरा बना लिया।
"यह तुम क्या कह रहे हो" युसुफ अपने हाथ प्रधानमंत्री की करीब रखते हुए बोला। "यह तो विनम्र के साथ काम करती है"
"झूठ बोल रही है ये" वकार अहमद ने तुरंत जवाब दिया "और विनम्र भी झूठा है, वह तो खुद इंडिया का एजेंट है"
यह सुनकर यूसुफ की आंखें और चुधिंया गई। उसे इस बात का नहीं पता था कि विनम्र भी इंडिया का एजेंट है। वह बड़ी-बड़ी आंखों से विनम्र की तरफ देखने लगा।
"यह सच नहीं है..." विनम्र ने वकार अहमद की बात का जवाब दिया। "मेरे लिए सीरिया से बढ़कर कोई देश नहीं...मेरा दिल जब भी धड़का है, सिर्फ और सिर्फ सीरिया के लिए धड़का है.....ना ही सीरिया से कोई बढ़कर है और ना ही उसे कोई लजीज..."
"हम अच्छे से जानते थे" युसुफ ने एक संतुष्टि वाली सांस ली और फिर निधि की तरफ देखने लगा। "लेकिन मेरे लिए ऐसा नहीं है...." निधि बोली " हां... में इंडिया की एजेंट हूं...." उसने जवाब दिया और रिवाल्वर पर अपनी पकड़ और तेज कर ली। जवाब में विनम्र ने भी रिवाल्वर की पकड़ तेज करते हुए निधि को बता दिया, उसे यहां वह किसी भी तरह का कदम उठाने नहीं देगा।
वकार अहमद फिर बोला " यह सब इनकी चाल है.... सब मिले हुए हैं" और फिर विनम्र की तरफ देखने लगा "अगर यह इससे ना मिला होता तो अब तक इस पर गोली चला देता" और सीधे अपनी बातों से विनम्र को निधि पर गोली चलाने के लिए मजबूर करने लगा।
युसूफ और प्रधानमंत्री तथा बाकी के 2 आदमी, वह हाल फिलहाल में तो इस पूरे परिदृश्य को अपनी आंखों से देख रहे थे। वकार अहमद ने फिर अपनी बात पर जोर दिया "देखा!! इसने अभी तक गोली नहीं चलाई.... मतलब साफ है... यह उससे मिला हुआ है"
युसुफ को भी यह बात हैरान कर रही थी। उसने विनम्र को कहा "तुम आखिर गोली क्यों नहीं चलाते इस पर... गोली चलाओ और इसका काम तमाम कर दो"
सब लोग विनम्र को निधि पर गोली चलाने के लिए मजबूर करने लगे, निधि भी खामोशी से देख रही थी की विनम्र क्या करता है क्या नहीं.... उसका भी पिस्तौल वकार अहमद की तरफ था पर वह भी अपना कदम नहीं उठा रही थी। आसपास बढ़ते दबाव के कारण विनम्र ने पिस्तौल का ट्रिगर दबाया और निधि पर गोली चलाने की स्थिति में आ गया...अंदर से उसका दिल तेजी से धड़क रहा था पर बाहर के दवाब के आगे.... शायद दिल का धड़कना काम नहीं आ रहा था। निधि ने विनम्र की तरफ देखा और फिर एक गहरी सांस लेकर प्रधानमंत्री के अगल-बगल बैठे दोनों आदमियों पर गोली चला दी। निशाना सीधे उनके सर के बीचो-बीच लगा। युसूफ तुरंत सकते में आया और अपना रिवाल्वर निकालकर निधि की तरफ करने लगा.... पर बीच में ही विनम्र ने आते हुए...अपने पिस्तौल के पीछे वाले हिस्से से यूसुफ के सर पर वार कर दिया। चोट लगते ही युसुफ बेहोश हो गया। वकार अहमद भी लड़ने वाली स्थिति में आया और उसने वहां के एक आदमी की पिस्तौल निकालकर निधि पर तान दी पर जवाबी कार्यवाही में विनम्र और निधि दोनों का पिस्तौल उसकी तरफ था।
प्रधानमंत्री के तो होश ही ठिकाने नहीं थे। उसे तो पता भी नहीं लग रहा था वह आज बचेगा या नहीं..... उसके साथ वाले 2 आदमी मारे गए.... युसुफ भी बहोश हो गया। गाड़ियों का काफिला आगे बढ़ता जा रहा था पर प्रधानमंत्री की गाड़ी के अंदर क्या हो रहा है किसी को भी इस बात की भनक नहीं थी। प्रधानमंत्री ने उन सबके सामने अपना वायरलेस निकाला, पर उनकी हरकत करते ही निधि ने उस पर रिवाल्वर तान दी.... विनम्र ने तुरंत अपने हाथ से उसका रिवाल्वर हटाते हुए कहा "तुम इन्हें कुछ नहीं करोगी" यह सुनकर निधि ने अपनी रिवॉल्वर नीचे की और फिर विनम्र को बोला "ठीक है... लेकिन तुम इन्हें बोल दो कि इनकी वजह से हमें किसी तरह का खतरा नहीं होना चाहिए.." उसका ईशारा प्रधानमंत्री की तरफ था। विनम्र प्रधानमंत्री की तरफ देखने लगा। प्रधानमंत्री ने गर्दन हिलाकर हामी भरी और वायरलेस पर ड्राइवर के बगल बैठे आदमी से कहा "गाड़ियों का काफिला हमारी सीक्रेट लेब की तरफ ले लो..." और फिर वायरलेस नीचे रख दिया।
निधि ने एक गहरी सांस ली और सीट पर बैठ गई। विनम्र भी बैठ गया। प्रधानमंत्री और वकार अहमद दोनों खामोश थे। निधि विनम्र को देख कर बोली "अब आगे क्या...!!"
विनम्र ने पहले वकार अहमद की तरफ देखा और फिर प्रधानमंत्री की तरफ " मैं समझाने की कोशिश करता हूं" वह प्रधानमंत्री से बोले "सर मुझे माफ करना... लेकिन मैं देश से किसी तरह की गद्दारी नहीं कर रहा...." और फिर एक गहरी सांस लेकर कहा "आप जो भी कर रहे हैं वह सही नहीं है.....अगर हम दूसरे देशों पर हमला करेंगे तो चारों और अशांति फैल जाएगी। हजारों निर्दोष लोग मारे जाएंगे। जंग से आज तक ना किसी का फायदा हुआ है और ना ही आगे भविष्य में होगा। आप जगं के इस विचार को छोड़ दे....यह जो थंडर लाइस आप लेना चाहते हैं वह किसी भी तरह के हथियार से ज्यादा खतरनाक है .... ऐसे में इन्हें नष्ट करें और आगे शांति से देश के विकास के लिए काम करें"
"तुम चाहते हो प्रधानमंत्री तुम्हारे आगे झुक जाए" वकार अहमद बोला "क्या तुम प्रधानमंत्री को कंट्रोल करना चाहते हो....वह भी उन्हें ब्लैकमेल करके" निधि ने तुरंत अपना पिस्तौल उसकी तरफ किया और कहा "तुम चुप ही रहो तो अच्छा है.... वरना मैं तुम्हें बोलने लायक नहीं छोडूंगी"
फिर दोनों प्रधानमंत्री के बोलने का इंतजार करने लगे। लुइस इल्लल्लाह कुछ देर सोचने के बाद बोला "देखो तुम्हारा कहना सही है.... पर वर्तमान में जिस तरह के हालात हैं वह जंग की ओर ही इशारा कर रहे हैं.... इराक बॉर्डर पर अपनी सेना लेकर तैयार खड़ा है, वो भी हम पर हमला करने के लिए। अगर मैं जंग नहीं करूंगा तो वह कर देंगे। जंग तो होकर ही रहेगी.... मेरे चाहने या ना चाहने से कुछ नहीं होगा"
"आप उसकी फिक्र ना करें" निधि प्रधानमंत्री का जवाब सुनकर बोली। "हमारी इराक से अच्छी जान पहचान है, हम लोग इराक की सेना को पीछे हटने के लिए कह देंगे। और वह मना भी नहीं करेंगे...."
"ईराक ऐसा कभी नहीं करेगा...." प्रधानमंत्री लुइस इल्लल्लाह बोले। "वहां का शासन निरंकुश और दूसरे देशों पर अधिपत्य करने वाला है"
"लेकिन यह विचारधारा तो आप लोगों की है, इराक ने तो खुद हम लोगों से मदद मांगी है। वह चाहते हैं कि हम इराक के लोगों को आपकी तानाशाही रवैए से मुक्त करवाएं। आपकी वजह से वह एक कभी न खत्म होने वाली जंग की तरफ जा रहे हैं..."
"क्या!! " यह सुनते ही प्रधानमंत्री ने ऐसे रिएक्ट किया जैसे मानो उनकी सबसे कीमती चीज चोरी हो गई हो। "और यह बात तुम लोगों से किसने कही..." उसने तुरंत निधि से पूछा।
"खुद इराक के प्रधानमंत्री ने। वह हमारे देश दौरे पर आए थे तब उन्होंने कहा था कि हमें सीरिया से खतरा है" निधि ने लुईस को इराक के प्रधानमंत्री के दौरे वाली बात बताई।
"झूठ बोल रहे हैं वह लोग" प्रधानमंत्री बोले "ऐसा कुछ नहीं है...... वह लोग हमारे आतंक से पीड़ित नहीं.... बल्कि हम लोग उनके आतंक से पीड़ित हैं.... जंग हम नहीं बल्कि वह लोग चाहते हैं। उन्होंने तुम लोगों के साथ भी धोखा किया है.... मुझे तुम्हारे हाथों मरवाकर वह इस जंग को बिना लड़े ही जीतना चाहते हैं"
"क्या यह सच है...." निधि के हैरानी की कोई सीमा नहीं थी। यह तो कहानी में एक नया ही ट्विस्ट था जिसके बारे में किसी को नहीं पता था। " हमें तो लग रहा था सीरिया के प्रधानमंत्री के इरादे ठीक नहीं, पर यहां तो अलग ही खिचड़ी पक रही है" निधि ने विनम्र को कहा।
"हमारे प्रधानमंत्री गलत नहीं हो सकते..." विनम्र बोला "लगता है इराक वाले तुम लोगों के साथ डबल गेम खेल रहे हैं"
निधि ने विनम्र की पूरी बात सुनी और फिर थोड़ी देर सोचते हुए बोली "लेकिन अगर ऐसा है तो आपको इन थंडर लाइन्स की इतनी क्यों पड़ी है" उसने यह सवाल प्रधानमंत्री से पूछा।
"अरे मामूली सी बात है!! यह थंडर लाइंस कोई ऐसी वैसी चीज नहीं, सब देश इसके पीछे पड़े हैं...... अगर यह मेरे हाथ पहले आती है तो जाहिर है!! मैं इसका सबसे पहले उपयोग अपने देश पर आने वाले खतरों को कम करने के लिए करता। मेरे लिए इस वक्त इराक से बड़ा कोई खतरा नहीं, ऐसे में मैं इसका इस्तेमाल करके कोई गलती नहीं कर रहा"
विनम्र के साथ-साथ निधि भी दुविधा में फंस गई। सीरिया के प्रधानमंत्री अच्छे हैं या बुरे इस बात का फैसला ले पाना उसके लिए मुश्किल हो रहा था। लेकिन उसका काम प्रधानमंत्री ने आसान कर दिया। प्रधानमंत्री बोले " लेकिन मैं अब समझ चुका हूं, इस गलती को करके सिवाय नुकसान के और कुछ नहीं होगा। मैं जंग की राह त्याग कर अमन और शांति के रास्ते पर बढुगां..... अब जंग नहीं होगी। हम लोग इराक से बात करके आपसी मसला भी सुलझा लेंगे। भले ही जंग के इरादे उनके हो पर अगर शांति से बात करेंगे तो इन्हें भी टाला जा सकता है"
यह सुनकर निधि और विनम्र दोनों के चेहरे पर मुस्कान आ गई। दोनों खुश थे, पर वकार अहमद के चेहरे पर खुशी नहीं थी। "यह आप क्या कह रहे हैं...!!" वह बोला "आपने तो कहा था आप इराक को खत्म कर देंगे"
"हां... लेकिन इन दोनों बच्चों ने मुझे समझा दिया है कि इस बात में कुछ नहीं पड़ा.... इसलिए अब ऐसा नहीं होगा"
यह बात उसे हजम नहीं हो रही थी, पर सिर्फ वही नहीं था जिसे यह बात हजम नहीं हो रही थी। उसके साथ साथ युसुफ को भी यह बात अच्छी नहीं लगी। युसुफ को बहुत पहले होश आ चुका था पर वह अभी भी बेहोश होने का नाटक कर रहा था। अचानक वह होश में आया और उसने तुरंत विनम्र के रिवाल्वर पर झपटा मारा.... मौके का फायदा उठाकर वकार अहमद की निधि पर टूट पड़ा। पूरा खेल बदल चुका था.... जो रिवाल्वर अब से कुछ देर पहले निधि और विनम्र के हाथ में था... वह अब वकार अहमद और युसुफ के हाथ में था। युसुफ बोला "तुम लोग क्या चाहते हो जो सपना में बचपन से देखता आ रहा हूं.... उसे छोड़ दूं। जिस मकसद के लिए मैं जीता आ रहा हूं उसे छोड़ दूं.... मैं इराक को बर्बाद होते देखना चाहता है.... और मैं किसी को भी इस रास्ते में नहीं आने दूंगा" फिर वह प्रधानमंत्री की तरफ मुड़ा "और आप!! आपको क्या हो गया है.... आप के इस मकसद की वजह से तो मैं आपका साथ दे रहा था....लेकिन अब जब इसे पूरा करने का वक्त आया तो आप बदल गए।"
लुइस बोला "देखो यूसुफ.... शांति और धैर्य से काम लो.... जंग से कभी किसी को फायदा नहीं होता"
"चुप रहो बेवड़े" उसकी यह बात युसुफ ने टोक दी "तुम तो क्या... तुम्हारा बाप भी इस जंग को होने से नहीं रोक सकता। यह उपदेश किसी और को देना...."
"यह कैसी भाषा का परिचय दे रही हो तुम" युसुफ की यह बात सुन कर लुइस को भी गुस्सा आ गया।
"चुप रहो!! तुम अब हमारे प्रधानमंत्री नहीं।" फिर उसने वायरलेस उठाया और ड्राइवर की सीट के बगल में बैठे आदमी को आदेश दिया "प्रधानमंत्री ने अपने इरादे बदल दिए हैं, वह अब लेब तो जाएंगे पर अकेले.... काफिले की बाकी की गाड़ियों को वापस लौट जाने का आदेश दे दो... खुफिया लैब में दूसरे आदमी भी अलाउड नहीं। सब खाली करवा दो"
उस आदमी ने यूसुफ की बात सुनी और दूसरी गाड़ियों को वापस लौट जाने का संकेत दे दिए। वैसे भी खुफिया लैब थी और यहां प्रधानमंत्री हमेशा अकेले आते थे,ऐसे में उसका इस बात पर भी शक नहीं गया कि प्रधानमंत्री खतरे में है।
जल्द ही पूरा काफिला वहां से निकल चुका था और अब सिर्फ प्रधानमंत्री की गाड़ी लैब की तरफ जा रही थी।
गाड़ी के अंदर निधि और विनम्र अगले कदम की तैयारी करने लगे पर अब उनके लिए सावधानी रखना ज्यादा जरूरी था। उनके साथ साथ सिरिया के प्रधानमंत्री की जान भी ख़तरे में थी। ऐसे में एक गलत कदम उनकी जान ले सकता था।
वकार अहमद और युसूफ दोनों की पिस्तौल निधि विनम्र और प्रधानमंत्री की तरफ थे। वह दोनों उन तीनों को लेकर लेब में जा रहे थे। अचानक रास्ते में एक मोड़ आया और गाड़ी तेजी से उस मोड़ पर मुडी... जिस वजह से उन दोनों की स्थिति डामाडोल हो गई। निधि और विनम्र दोनों ने इस बात का फायदा उठाया और उनका पिस्तौल पकड़ लिया। पर वह दोनों भी आगे से सावधान थे। उनकी पकड़ पिस्तौल से छुट्टी नहीं। अब एक एक पिस्तौल पर दो-दो लोगों के हाथ थें। एक तरफ विनम्र और वकार अहमद तो एक तरफ निधि और यूसुफ।
चारों में पिस्तौल को लेकर द्वंद चल रहा था, कब कौन से पिस्तौल की गोली किस पर चलेगी कुछ कहा नहीं जा सकता था। खतरा सभी को था, जान सबकी हवा में लटकी हुई थी। कोई भी निकलने वाली गोली का शिकार हो सकता था। निधि द्वारा पकड़े गए युसुफ के पिस्तौल की नली विनम्र की तरफ थी पर ट्रिगर पर निधि का कंट्रोल था। वही वकार अहमद के पिस्तौल की नली प्रधानमंत्री की तरफ थी पर वहां ट्रिगर पर कंट्रोल विनम्र के पास था। अचानक वकार अहमद ने गाड़ी का दरवाजा खोल दिया जिससे विनम्र एक झटके के साथ बाहर दरवाजे से जा लटका, विनम्र को नीचे गिरता देख निधि का ध्यान भी वकार अहमद से भटका जिसका फायदा उठाकर वकार अहमद ने निधि को धक्का दे दिया। निधि पूरी तरह से नीचे गिर गई। निधि नीचे गिर चुकी थी जबकि विनम्र पीछे लटका हुआ था। विनम्र के एक हाथ में यूसुफ की पिस्तौल थी और एक हाथ में गाड़ी का एक हिस्सा। जबकि वकार अहमद पूरी तरह से खाली था। वकार अहमद ने रिवाल्वर चलाने के लिए विनम्र पर तानी पर इससे पहले वह चलाता विनम्र ने गाड़ी छोड़ दी।
विनम्र और निधी दोनों गाड़ी से नीचे गिर गए। गाड़ी के अंदर वकार अहमद और युसूफ दोनों ने गाड़ी का दरवाजा बंद किया "अब किसी तरह का कोई खतरा नहीं था"यूसुफ ने प्रधानमंत्री की तरफ देखा "तुम्हारे साथ क्या करना है, यह तो हम लेब में ही जाकर सोचेंगे" और प्रधानमंत्री को लेकर अकेले ही लेब की तरफ चले गए। निधि और विनम्र दोनों धूल में गिरते हुए काफी पीछे रह चुके थे।
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